शायरी – अच्छा दिल और सच्ची आंखें मिलना अब नामुमकिन है

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अच्छा दिल और सच्ची आंखें मिलना अब नामुमकिन है
अक्लवालों की महफिल में रोना अब नामुमकिन है

जिंदगी की हर गजल में लिखता रहा मैं दर्द को
जाने कब गम खत्म होगा कहना अब नामुमकिन है

प्यास नहीं कुछ पाने का और भूख नहीं है जीने का
इस छाती में दुख दुनिया का उठना अब नामुमकिन है

एक मुकम्मल इंसां बनना तन्हाई की मंजिल है
नर-नारी के इस दलदल में जीना अब नामुमकिन है

©RajeevSingh

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