शायरी – जलते हुए खिजां में ये सावन कहां से आया

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इतनी तो गनीमत है कि जीता हूं, न मरता हूं
इतनी ही जरूरत है कि तुझे याद मैं करता हूं

नस-नस में मेरे बह रही है दर्द की दरिया
अब खून किसी का भी पीने से मैं डरता हूं

जलते हुए खिजां में ये सावन कहां से आया
प्यासी सी जमीं पे मैं बरसात में रहता हूं

अब ऐसी फकीरी है, क्या खोना है क्या पाना
जो रहगुजर सूनी हो, उस ओर ही चलता हूं

(खिजां- पतझड़)

©RajeevSingh #love shayari

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