शायरी – भटकता हूँ मैं आकाश में एक गजल के लिए

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भटकता हूं मैं आकाश में एक गजल के लिए
निहारूं चांद-सितारों को एक गजल के लिए

कदम जमीन पे चलते हैं निगाहों के बिना
ठोकरें खाता हूं मैं राहों में एक गजल के लिए

मुहब्बत भी करता हूं, बेवफा भी बनता हूं
फिर जोगी भी बन जाता हूँ एक गजल के लिए

एक शहर है, एक दरिया है, मेरे शामों में
रोज तन्हा वहां बैठता हूँ एक गजल के लिए

©RajeevSingh # love shayari #share photo shayari

One thought on “शायरी – भटकता हूँ मैं आकाश में एक गजल के लिए”

  1. Kyo hasta h ensan Rone ke bad. Jeena fir bhi padta h Sab kuchh khone ke bad. Socha aaj sabko yad karle kya pta aan
    kh hi na khule aaj sone ke bad . pavan from ,U.p

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