शायरी – वो सामने बैठी है चाय की दुकान में

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हम इधर खड़े हैं किराए के मकान में
वो सामने बैठी है चाय की दुकान में

सोचता हूं कभी उनकी राह रोक लूं
डर है कि पहुंच न जाऊं श्मशान में

इशारा तो करता हूं मगर देखती नहीं
कैसे कहूं कि मिलो बगल के बगान में

कोई नहीं आई है अब तक जिंदगी में
यही दर्द रहता है दिल ए परेशान में

(अपने मुहल्ले में बगान यानि पार्क के बगल में चाय की दुकान से प्रेरित गजल)

©rajeevsingh

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2 thoughts on “शायरी – वो सामने बैठी है चाय की दुकान में”

  1. Ak din humse juda ho jaoge yaro, kuchh din bad hme bhul jaoge yaro, jo sath gujare the lumhe humne, bhala kaise use bhul paoge yaro.

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