शायरी – कैसी है आशिक की फितरत, क्या कहूं

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कैसी है आशिक की फितरत, क्या कहूं
इसे सुकूने दिल से है नफरत, क्या कहूं

दिल लगाया तो अक्ल क्यों कम हो गई
नादानों सी हो गई है हरकत, क्या कहूं

जिंदगी का क्या होगा, कह नहीं सकता
किधर चली गई मेरी किस्मत, क्या कहूं

जमाने से वो आखिरकार इतनी डर गई
दे न सकी मिलने की मोहलत, क्या कहूं

©राजीव सिंह शायरी

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