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शायरी – अपने समाज में आजादी कब मिलेगी

आजादी का  जश्न जब हम 15 अगस्त को मनाते हैं तो क्या हम सोचते हैं कि आजादी का सही मतलब क्या होता है? क्या हम सही मायनों में आजाद हो पाए हैं? हमारे पास क्या होगा तो हम आजाद कहलाएंगे?

आज हमारे ऊपर समाज ने जाने कितनी पाबंदियां लगा रखी हैं। लोग यह कहते हैं कि ये पाबंदियां इंसान की भलाई के लिए हैं। आप किससे शादी करेंगे, किससे प्यार करेंगे, किसको जीवनसाथी बनाएंगे, जिंदगी के किस मोड़ पर क्या फैसला लेंगे, ये सब तो हमारे रिश्तेदार और समाज तय कर रहे हैं, फिर हम आजाद कैसे हैं?

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Aazad Parindon Ke Pankhon Ka Bayan Sun Le
Pinzre Ki Hakikat Kya, Ye Meri Zuban Sun Le

क्या अंग्रेजों ने सिर्फ हमें गुलामी की जंजीरों में बांधा था? क्या हमारे समाज की दकियानूसी बातों ने हमें जंजीरों से नहीं बांध रखा है? क्या हम उन जंजीरों में बंधकर घुटन महसूस नहीं करते? तो फिर हम आजाद कैसे हैं?

चारों तरफ इज्जत की दीवारें समाज में बनी हैं। इज्जत की दीवारों में न जाने कितनी जिंदगियों को चुन दिया जाता है। घर के फैसलों के अनुसार चलो तो इज्जत बचती है। जिंदगीभर दूसरों के फैसलों पर चलो तो इज्जत बचती है। क्या ये आजादी है? नहीं ये अंग्रेजों की गुलामी से भी बदतर है। जब तक परंपराओं के सड़े हुए विचारों से आजादी नहीं मिलेगा, तब तक इंसान की आजादी की कल्पना नहीं की जा सकती।

इन्हीं भावनाओं को लेकर यह गजल मैंने लिखी है जिसमें यह सवाल है कि फिरंगियों से तो लड़ लिया हम सबने, लेकिन अपने समाज की गुलाम बनाने वाली प्रथाओं से कब लड़ेंगे, कब इनके खिलाफ आवाज उठाएंगे।

फिरंगियों से तो आजादी मिल गई हमें
अपने समाज में आजादी कब मिलेगी

इस समाज के चप्पे चप्पे पर बैठें हैं जो
उन ठेकेदारों से आजादी कब मिलेगी

मुझे आगे बढ़ता देखकर जो जलते हैं
ऐसे रिश्तेदारों से आजादी कब मिलेगी

चारों तरफ इज्जत आबरू की दीवारें हैं
कैद से इश्क को आजादी कब मिलेगी

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