शायरी – दिल से निकलेगा कभी तो बरसते बादल

ढ़ूंढ़ते हैं तेरे साहिल पे मुहब्बत के निशां

दर्दे दरिया ये बता कि समंदर है कहां

 

बन चुके हैं मुसाफिर पर किधर जाएंगे

कदमों तले मंजिल का रहगुजर है कहां

 

दिल से निकलेगा कभी तो बरसते बादल

इन आंखों में अभी वो पतझड़ है कहां

 

रोनेवाले तो तलाशेंगे कहीं अपनी तन्हाई

मगर इस शहर में ऐसा मंजर है कहां

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