शायरी – अब किसी दगाबाजी से दिल नहीं दुखता

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जाने किसके लिए जमाने के बाद तरसा है
आसमा आज रो रो कर बेपनाह बरसा है

मैं अभी झील हूं, बरसाती नदी न बन जाऊं
मेरे शहर के बाशिंदों को हो गया डर सा है

वह बार बार एक दरवाजे से लौट जाता है
भले बुलाती है वो कि आ ये तेरे घर सा है

अब किसी दगाबाजी से दिल नहीं दुखता
कई बार खाए धोखों का हुआ असर सा है

©rajeev singh shayari

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