शायरी – कहीं पर भी मगर इश्क का बसेरा नहीं निकला

new prev new shayari pic

इधर वो चांद डूबा था उधर सूरज नहीं निकला
गमे दिल से कभी खुशी का सबेरा नहीं निकला

आवारगी की जिंदगी तो जिंदगीभर चलती रही
कहीं पर भी मगर इश्क का बसेरा नहीं निकला

जमाने में जाने किस किसको नागन डस चुकी
उसे पकड़ने को डर से कोई सपेरा नहीं निकला

जब जब मुसीबतों में घिर गया था मैं बुरी तरह
मुझे बचाने को घर से वो यार मेरा नहीं निकला

©राजीव सिंह शायरी

Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.