शायरी – तू नहीं आई एक बार जो गई

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जागते-जागते सहर हो गई
इस सफर में ही बसर हो गई

रातभर रोज ही तमाशा किए
देखनेवाले की नजर सो गई

खोजता कौन है मुसाफिर को
तू नहीं आई एक बार जो गई

तेरे सिवा आखिर कौन है मेरा
ये सोचते हुए जिंदगी खो गई

सहर – सुबह

©राजीव सिंह शायरी

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