शायरी – जाने कितने बरस भटकूंगी

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इस जनम में तुम मिले हो
मन के सूने अंबर में
चांद बनकर तुम खिले हो

जिन दिशाओं में हम चले हैं
तेरे साये साथ चले हैं
जिन नगरों में कोई नहीं है
वहां पे तेरे निशां मिले हैं
वीराने से इस जंगल में
तुम ही तो एक राह मिले हो
मन के सूने अंबर में
चांद बनकर तुम खिले हो

जिधर भी देखा, तुमको ही पाया
पर तेरी काया से मिल नहीं पाया
खोजा बहुत खुली नजरों से
दर्द किसी में नहीं था समाया
जाने कितने बरस भटकूंगी
जाने कहां तुम छुपे हो
मन के सूने अंबर में
चांद बनकर तुम खिले हो

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