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शायरी – इस बदनसीब के इश्क में तुझे डूबकर भी क्या मिला

इश्क की टूटन में दो दिल टूटते हैं। एक रूठता है तो दूसरा टूटता है। ऐसे में कौन किसको बेवफा कहे? दुनिया की दीवारें नसीब बनकर आती हैं और जुदाई दे जाती हैं। हर इश्क का अंजाम जुदाई क्यों हैं, ये कैसा नसीब है जो हमेशा बदनसीब है।

इश्क में दो वजूद जल जाते हैं। एक दूसरे से दूर होकर तब तक जलते रहते हैं जब तक दिल में खाक नहीं बच जाता। उस खाक में इश्क फकीर हो जाता है। मोहब्बत की चिता जब जलकर ठंडी होती है यही अहसास होता है कि बचे राख में कुछ है नहीं, बस एक जिंदगी है जो खाली-खाली सी है, तन्हा सी है। दोनों एक-दूसरे से पूछते हैं कि बताओ इश्क में जलकर आखिर दोनों को क्या मिला?

उसकी मोहब्बत शायरी इमेज

जब से इश्क हुआ दोनों दर्द में ही रहे। जमाने से दूर किसी कोने में सुबकते रहे। आशिक अपने महबूब से पूछता है कि बताओ तुमने एक बदनसीब से इश्क क्यों कर लिया? इश्क शायद खुशनसीब नहीं होता, खुशनसीब से नहीं होता..इश्क हमेशा दर्द से होता है जो खुद ही बदनसीब होता है।

इश्क का दर्द जब गहरा होता है तो जिगर के आंसू लहू बन जाते हैं। दिल छलनी होता है तो जख्म से आंसू भी सुर्ख हो जाते हैं लेकिन इन लहू को आंखें बाहर छलकने नहीं देती हैं। इश्क के आंसुओं को रोकनेवाली नजर को भी भला क्या मिल जाता है? शायद दर्द का एक सागर…

यह गजल दो दिलों की जुदाई के अहसासों को समेटे हुए है….

मुझे टूटकर क्या मिला, तुझे रूठकर भी क्या मिला
जब बेवफा ही नसीब हो तब रोकर भी क्या मिला

अब आग से हम दूर हैं पर खाक के तो पास हैं
ठंडी हुई है चिता मेरी, मुझे जलकर भी क्या मिला

मेरे साथ गर्दिश में रहे, मेरे संग-संग रोते रहे
इस बदनसीब के इश्क में तुझे डूबकर भी क्या मिला

ये जिगर लहू से भर गया जब जख्म भी रिसने लगे
मेरे आंसुओं को रोककर इस नजर को भी क्या मिला

©RajeevSingh #love shayari

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