शायरी – झूठ का आईना था हरेक आदमी में

खुदा न मिला था हरेक आदमी में

न सच का पता था हरेक आदमी में

 

सबकी आंखों में दुनिया की सूरत दिखी

झूठ का आईना था हरेक आदमी में

 

सब लड़ते रहे जब अपने ही घर में

कोई अपना कहां था हरेक आदमी में

 

दबके दौलत तले रूह भी मर गए

जिस्म ही बस बचा था हरेक आदमी में

Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.