फेसबुक शायरी

फेसबुक शायरी 1-10

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घटती गई हर साल में मिलने की दो घड़ी

सैकड़ों जख्म की रंगत को आशना लिखूं

ये दिल बड़ा प्यासा है कुछ और प्यास दे दो

मुहब्बत आप क्या जानें, शराफत आप क्या जानें

जिंदगी तुमसे खून का रिश्ता है मगर

यहां दोस्त हैं कई मगर हमराज का अकाल था

दुनिया में रहेंगे बेसहारे जब तलक

हो गया आसान कितना जीना अब तन्हाई में

क्या मिलेगा दिल को इस दौलत के बाजार में

आंसू पीकर ही अपनी प्यास बुझा लेते हैं

फेसबुक शायरी 11-20

हर दर्द को सहता गया हर जख्म पे गाता गया

सीने से लगाने वाला कोई नहीं

कैसा सफर है ये जिसे नसीब नहीं हमसफर

मुझपे अपना जां निसार दिलबर चली गई

आस का आईना टूट गया लेकिन तुमको खबर नहीं

इश्क में पागल दीवानों का अंजाम मेरी तरह न हो

इस मोहब्बत को मिटाने का हक सबको है

अपनी दुनिया वो नहीं जिसमें दिल का नाम नहीं

तुम चाहते हो लोग तुम्हें देखें

दुनिया जिनको ठुकराती है पागल बरबाद समझके

फेसबुक शायरी 21-30

मुझसे जुदा जुदा हुआ तो क्या हुआ

कब जाने मरासिम हो कब जाने मोहब्बत हो

तेरे दर्द के इन अश्कों में

गम इस कदर बरस पड़े सावन भी शर्मसार हो

इश्क के फूल खिलते हैं तेरी खूबसूरत आंखों में

मुझसे दुख अपना छुपाते जा रहे हो

जिंदगी थी तो तन्हा थे

आज फिर वो खयालों में मिल जाएंगे

समंदर को बिलखने से भला क्या मिलता

तू परेशां रहता है मेरे लिए दिल से अब भी

फेसबुक शायरी 31-40

अगर कहीं मिल जाओगे, सौंप देंगे इसे तुमको

तेरी खामोशी सहेजूंगी मैं तुमसे जुदा रहकर

रातों के इन रहगुजरों पे जिंदगी तन्हा रह गई

इश्क में इनके सिवा कुछ भी हासिल नहीं होता

तेरे लिखे प्यार के खतों में तेरा साया दिखता है

लड़ जाऊंगा दुनिया से लेकिन तू रुसवा होगी

मौत के दर पे मैं खड़ा हूं कैद में मेरी जान है

गमजदा तेरी सूरत पे खौफ का जो मंजर है

ये दिल न लगा उनसे जो लौटकर फिर जाएगा

इश्क का सागर सदियों से बेवफा से परेशां है

फेसबुक शायरी 41-50

मैं क्या जानूंगी जब तू कहीं बोलता भी नहीं

कब तक जीते रहेंगे रहके तुमसे जुदा

उसके गले लगूंगी, वो बेजार है कहां

तेरे इश्क में दर्द और शिदद्त भरी उदासी है

इश्क की बात पे हम अड़ गए जान देने पर

इश्क की आग में आशियां जल जाता है

एक राह पे चलता सिसक रहा था कोई

मेरे खाक होने पर तू मत रोना

दिल में जो दबी रही वो अरमान अब दफनाने दो

खूं ये जलता ही रहेगा मरते दम तक

फेसबुक शायरी 51-60

इतनी ही जरूरत है कि तुझे याद मैं करता हूं

दर्द कितना भी जहर उगले आंखों से मगर

चंद बरस की है जो तन्हा जिंदगी मेरी

मुझे टूटकर भी क्या मिला

बंद आंखों में रोते ही रहे शबनम कितने

अब तो शायद तेरे दर पे कभी आ न सकूं

प्यार के आईने में कोई अक्स मयस्सर नहीं

तेरे बिन कैद में सुकूं से बसर हो न सका

ये इश्क का इंसाफ है कि तेरी हर खता मुआफ है

कोई नहीं यहां अपना मेहरबां सा कोई

अच्छा शायरी 61-70

मैं जाता हूं खुद को रुलाने से पहले

मैं भी शायद जिंदगी का एक टूटा ख्वाब था

ये मेरा सनमखाना बेघर का आशियां है

मैं उसी की रोशनी में उम्रभर जलने गया

कभी मुझसे मिलोगी तो हकीकत खुल ही जाएगी

मेरा साया ही गुनहगार था

दुख में ही कटती रात है

हम उधर को चले जिस डगर पे मेरी तन्हाई है

इश्क की इस आग में सबकुछ मेरा जल गया

जो दर्द बनके जी लिए वो मरहले क्या थे

फेसबुक शायरी 71-80

दिल भी नहीं, जां भी नहीं

रूह में तेरा इश्क है डूबा

तन्हा सी मुसाफिर हो तुम, तेरी अदाओं में है उदासी

तेरा इंतजार भी समंदर से बड़ा लगता है

इश्क में दिल जलाया मुझे खाक मिला

आपके बारे में दिल सोचता चला गया

जिसकी तलाश में जीते जी हम तन्हा मर गए

जानेवाले मेरी जान लेकर जाओ

प्यास नहीं कुछ पाने का और भूख नहीं जीने का

मेरे दर्द के चिराग को जलने से है फुरसत कहां

फेसबुक शायरी 81-90

तू अलग हुई पर तुमसे अलग न हो सका

अपने मजार पे सनम तेरा नाम मैं लिखवाऊंगा

हम अपने दिल के कांटों में तेरी सूरत दिखा देंगे

एक बार खुद को मेरे पास आ जाने दे

काश सबको वो इश्क की नजर देता

तेरी दर्द भरी आंखों में उसे पा न सका

तेरे इतने अहसान हम ले के चले

मैंने शहनाई की आवाज को सुनकर जाना

उसके गुनाहों की कोई दास्तां तो मिले

गूंज न पाई मेरी आहें मरते दम तक

फेसबुक शायरी 91-100

अब मेरी दीवानगी की इंतहा तो हो चुकी

उनके अहसानों तले खुद को बर्बाद करेंगे

आग में डूबके मरने की दुआ दो इसको

तेरे दामन में चांदनी हमेशा रहे

तू खुदा की नूर है मैं बुझा चिराग हूं

दगा देकर भी वो हंसते रहते हैं

क्यों लगते हैं मेरे दिल को इतने प्यारे

काश कि मैं जिंदा रहता मरने के बाद

उनका चेहरा उदास सा नजर आए

गम इस कदर बरस पड़े सावन भी शर्मसार हो

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