शायरी – खुद में ही तुम उलझी हो, मुझको क्या सुलझाओगी

भूल नहीं पाते हैं तुमको, कितने भी मैं कर लूं जतन

तेरी ख्वाहिश मिट नहीं पाती, यादों में तुम हो सनम

 

आज अगर तुम मिल जाओगे, कैसे अपनाएंगे तुमको

कोई खुशी न दे पाएंगे, दूर तलक है गम ही गम

 

जीना भी था तेरे खातिर, जीते हैं हम आज भी यूं ही

जैसे-तैसे दिन कटते हैं, रातभर सहते हैं सितम

 

खुद में ही तुम उलझी हो, मुझको क्या सुलझाओगी

और भी उलझे हैं देखो, तेरे संग चल दो कदम

 

तेरे करम और तेरे सितम, पाएंगे हम जनम-जनम

अपनी तन्हाई तो सजेगी जब तक है यादों का भरम

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