शायरी – किसका किसके साथ निभेगा, आखिर कितने दिनों तक

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रहते हैं तो ये लोग शहर में, एक-दूजे के किनारे-किनारे
लेकिन जी रहे हैं सब अपनी बालकनी के सहारे

घर-घर में हर इंसां को अपने लिए ही वक्त नहीं
ऐसे में तन्हा बूढ़े लोग सेवा की खातिर किसको पुकारे

किसका किसके साथ निभेगा आखिर कितने दिनों तक
कब क्या होगा पता नहीं, कैसे कोई कहे हम हैं तुम्हारे

ऐसे शहर में आए हो तो क्या जी पाओगे ऐ दिल
दीवारों के बीच में घुटके हो जाओगे भगवान को प्यारे

दिल्ली शहर पर लिखी गई एक गजल।

©RajeevSingh

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