शायरी – फिर उस जख्म को जीने का बहाना याद आया

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भूल गया था जो मंजर, वो जमाना याद आया
मुद्दतों बाद दिखी तुम, वो फसाना याद आया

नए शहर की गलियों में खुशी खोज ली तुमने
पुराने शहर की गलियों का वो रोना याद आया

आबाद हो गई किसी की जिंदगी तेरे आ जाने से
किसी को अपनी बर्बादी का तराना याद आया

एक नया दर्द फिर आगोश में ले रहा है मुझे
फिर उस जख्म को जीने का बहाना याद आया

©राजीव सिंह शायरी

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