शायरी – मेरे ख्वाबों के उजड़े हुए से मंजर में

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रू-ब-रू आते हैं वो माजी के आईने की तरह
हुस्न पर्दे से निकलकर निगाहों पे छा जाती है
उसके जलवों के आगोश में सांसें तो क्या
धड़कनों की रफ्तार भी बढ़ सी जाती है

मेरे ख्वाबों के उजड़े हुए से मंजर में
अश्कों से लिखे गए कुछ नगमें हैं
जिन लम्हों ने दिए हैं ये जख्म के टुकड़े
उन टुकड़ों में बस तेरी ही परछाई है

मरहले शब के गुजरते हैं सजदे में तेरे
हर पहर तेरी इबादत में कट जाती है
ये जवानी के सितम हैं ओ मेरे सनम
तेरे इस दर्द को संजोने की कसम खाई है

मुझपे ऐतबार किया था तुमने एक दिन
तुम भले तोड़ दो, हम कभी न तोड़ेंगे
तेरे वादे, तेरे कसमों को चुन-चुनकर
अपने यादों की ये कलियां सजाई है

हमने सोचा न था कि एक दिन ये आएगा
तेरी यादों में बस अपनी बसर होनी है
ये हकीकत जब हमको नजर आई है
तेरी तस्वीर अपनी रूह पे बनाई है

©RajeevSingh

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