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शायरी – तनहा सफर में दर्द की आग जो भड़की

शायरी तनहा सफर में दर्द की आग जो भड़की वो चुभने वाली शोलों की संगीन होती है

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चिरागों को जलाने से रात रंगीन होती है
दिल को जलाने से ये गमगीन होती है

मेरी आंखों की उदासी बढ़ती है जितनी
एक हुस्न की सूरत और भी हसीन होती है

टूटकर भी बार बार वो ज़हन पे छा गई
रातभर ख्वाबों में एक नाजनीन होती है

तनहा सफर में दर्द की आग जो भड़की
वो चुभने वाली शोलों की संगीन होती है

©राजीव सिंह शायरी

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