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शायरी – रंग लिया जबसे हाथ मोहब्बत के खून से

दीवानों को देखते ही पत्थर ही मारेंगे वो और क्या उम्मीद रखें लोगों के हुजूम से फिर भी हो रहे पैदा लैला मजनू बस्ती में रोज छपता है अखबार उनके ही खून से

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रंग लिया जबसे हाथ मोहब्बत के खून से
तबसे रिश्तेदार जी रहे कितने सुकून से

सदियों से कैद है लैला घर की दीवारों में
घरवालों को दुश्मनी है मजनू के जुनून से

दीवानों को देखते ही पत्थर ही मारेंगे वो
और क्या उम्मीद रखें लोगों के हुजूम से

फिर भी हो रहे पैदा लैला मजनू बस्ती में
रोज छपता है अखबार उनके ही खून से

©rajeevsingh         शायरी

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