शायरी – कभी जो उठती थी बेकरार होकर

कभी जो उठती थी बेकरार होकर

ये बुझी आँखें अब तुझे बुलाती नहीं

कभी जो जिंदा थी तलबगार होकर

इन मरती साँसों को तू सताती नहीं

Advertisements

Leave a Reply