दिल छूने वाली शायरी

शायरी – जहां दुश्मन रहते हों खुद अपने ही मकान में

चलिए अब क्या करना ऐसे बस्ती में रहकर जहां दुश्मन रहते हों अपने ही मकान में मैं भटकूं तो मुझे दुनिया में न लाना जिंदगी लौटके आना नहीं है इस जिंदा श्मशान में

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दिल से निकली आह खो गई आसमान में
कोई सुनता नहीं दास्तां दुनिया जहान में

हर तरफ यहां सबको इश्क की तलाश है
मगर दिल ही नहीं उनके जिस्मो जान में

चलिए अब क्या करना ऐसे बस्ती में रहकर
जहां दुश्मन रहते हों अपने ही मकान में

मैं भटकूं तो मुझे दुनिया में न लाना जिंदगी
लौटके आना नहीं है इस जिंदा श्मशान में

©राजीव सिंह शायरी

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