शायरी – मजबूरियों की सूली पे चढ़ जाती है बेवफा

इल्जाम लगा देने से बात सच्ची नहीं हो जाती

दिल पे क्या बीतती है किसी से कही नहीं जाती

मजबूरियों की सूली पे चढ़ जाती है बेवफा

क्या करे वो जब अपनी ही जिंदगी वफा नहीं पाती

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