शायरी – ऐसी बस्ती में रो रहे हैं पत्थर कई

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धन-दौलत के लिए लड़ रहे हैं शहर कई
इस आग में जल रहे हैं शहर कई

और पाने की चाहत में दुखी रहते हैं
ऐसी बस्ती में रो रहे हैं पत्थर कई

दूसरों की तरक्की से परेशान होकर
ठीक से सो नहीं पा रहे हैं नजर कई

होड़ ऐसी है खजाने को पा लेने की
अपने रिश्तों में उठ रहे हैं खंजर कई

©RajeevSingh

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