शायरी – बेटियों आवाज दो, बेटियों एक राग दो

बेटियों आवाज दो, बेटियों एक राग दो

अपने गीतों को तुम अब खुद ही आवाज दो

 

दुनियादारी की रस्मों में तेरी कोई इज्जत नहीं

इन रिवाजों को तुम अब एक नया आकार दो

 

पर्दों के पीछे रहोगी, पीछे ही रह जाओगी

इन दीवारों को हटाकर जीवन को विस्तार दो

 

इस जमीं की जिंदगी में तू किसी से कम नहीं

पैरों को मजबूती दो, आँखों को आकाश दो

 

अब गुलामी की फितरत दिल से तू निकाल दे

सदियों से जकड़ी रूह को आजादी की सौगात दो

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