शायरी – रोज ही आते हैं वो तकरार के बहाने

रोज ही आते हैं वो तकरार के बहाने

वो क्या चाहते हैं ये वो ही जाने

हम चुप रहके बस सुनते रहते हैं

उनके शिकवा और प्यार के फसाने

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