शायरी – जी रहे हो आशियां में आईने की तरह

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जी रहे हो आशियां में आईने की तरह
इतने जुबां वालों के बीच बेजुबां की तरह

टूट जाओगे जमाने से दगा मत खाना
यहां मिलते हैं बेवफा भी मेहरबां की तरह

चुप रहते हो और खुद पे सितम ढाते हो
फिर भी दिखते नहीं हो परेशां की तरह

तेरे दिल में बसा है उल्फत का सागर
मगर आंखें हैं तुम्हारी रेगिस्तां की तरह

©RajeevSingh