शायरी – जिस्म से उड़ चला है परिंदा न जाने कहां जाएगा

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ये बेगानी शाम बस कुछ पल की मेहमान है
रू-ब-रू मेरे कोई अपना नहीं, एक सुनसान है

हम उधर को चले जिस डगर पे मेरी तन्हाई है
उस शहर में जहां किसी शै से न मेरी पहचान है

मेरे आठों पहर में कांटे हैं बस और कुछ भी नहीं
मेरे दामन पे हरसू लिखा हुआ दर्द का नाम है

जिस्म से उड़ चला है परिंदा न जाने कहां जाएगा
आसमानों में कितनी दिशाएं हैं, सबसे वो अंजान है

(हरसू- हर ओर)

©RajeevSingh # love shayari #share photo shayari

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