शायरी – तेरे जैसा कोई भी गजल हो न सका

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मेरी तन्हाई में किसी का दखल हो न सका
मेरी किस्मत में कभी भी बदल हो न सका

यूं तो लिखी हैं हमने तुझपे ही सैकड़ों गजलें
पर तेरे जैसा कोई भी गजल हो न सका

मैं भी एक आशियां में बंद हूं दुनिया की तरह
तेरे बिन कैद में सुकूं से बसर हो न सका

इतनी बेचैनी है कि रूह निकल न जाए कहीं
हिज्र में मौत से भी मेरा मिलन हो न सका

(हिज्र- जुदाई)

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