महबूबा शायरी

शायरी – इस दर्द के सागर में दिल कैसे सलामत हो

शायरी एक रंज सा होता है, सीने के सफीने में इस दर्द के सागर में दिल कैसे सलामत हो परवाज़ आसमां में उस चांद को छू लेता गर उसके ही वश में मिलने की किस्मत हो

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कब जाने मरासिम हो, कब जाने मुहब्बत हो
इस आस में जीते हैं, एक दिन तो कयामत हो

किसका कदम बढ़ेगा, किसके रहगुजर पर
मंजिल तो दो तरफ हैं, दोनों में कशमकश हो

एक रंज सा होता है, सीने के सफीने में
इस दर्द के सागर में दिल कैसे सलामत हो

परवाज़ आसमां में उस चांद को छू लेता
गर उसके ही वश में मिलने की किस्मत हो

(मरासिम- रिश्ता, संबंध)
(सफीना- नाव)

©RajeevSingh # love shayari #share photo shayari

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