शायरी – इश्क एक मजबूर ही इस जमीं पे कबसे है

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चाँदनी बड़ी दूर ही आसमा पे कबसे है
इश्क एक मजबूर ही इस जमीं पे कबसे है

आज सुनता हूँ कहीं पर हो गया ये हादसा
प्रेमियोँ को फूँकने का रस्म यहाँ पे कबसे है

प्यार ये अपनों से भी भला क्यूँ करने लगे
खून के रिश्तों में भी दुश्मनी ये कबसे है

अक्ल से जो काम लेंगे, क्या करेंगे वो वफा
दिल को सौदागर बनाने का चलन ये कबसे है

©राजीव सिंह शायरी

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