शायरी – कौन सा जुर्म किया था जो मुझे रूलाता था

कौन सा जुर्म किया था जो मुझे रूलाता था

या ख़ुदा एक नज़र बस उसे तो देखा था

 

कैसे बदलेंगे हम अपना सूफियाना मिज़ाज

हुस्न को देखकर सज़्दे में जो झुकता था

 

जिंदगी रह गई तेरे बिना गमे-तन्हा

इस फकीरी की तबीयत में तुझे खोया था

 

तू मुझे इश्क में मुज़रिम न ठहरा वाइज़

सदियों से इस गुनाह पे हक मेरा था

 

(वाइज़- मज़हब या धर्म का उपदेशक)

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