शायरी – पंछी के खातिर दरिया की कश्तियाँ बेकार हैं

टुकड़ा-टुकड़ा आईना है फिर भी सँवरते हैं वो

टूटे हुए इन दायरों में तन्हा ही रहते हैं वो

 

टहनी के अंतिम छोड़ पे जाकर जैसे फूल खिला

ऐसे ही दुनिया से जरा दूर-दूर दिखते हैं वो

 

पंछी के खातिर दरिया की कश्तियाँ बेकार हैं

कुछ इस तरह इश्क की दरिया में उड़ते हैं वो

 

कहिए कि अब कैसे कहें उनसे हम दिल की बात

आँखें मिलाना तो दूर, कभी नहीं मिलते हैं वो

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