द लास्ट लीफ फोटो

ओ हेनरी की कहानी ‘द लास्ट लीफ’ (पढ़ें हिंदी में)-1

द लास्ट लीफ (आखिरी पत्ता)
वाशिंगटन स्क्वायर के पश्चिम में एक छोटी सी बस्ती में बहुत सारे तंग रास्तों वाली उलझी हुई गलियाँ थीं जिन्हें वहाँ के लोग ‘प्लेसेस’ कहते थे। इन गलियों में अचंभित करने वाले घुमाव और कोण थे। यहाँ एक गली खुद को एक या दो जगहों पर काटती थीं। इसमें कलाकारों को बहुत बड़ी संभावना दिखी। यहाँ दुकानदार अगर पेंट्स, पेपर और कैनवास का पैसा माँगने कलाकार के पास आया तो ये गलियाँ उसे बिना पैसा पाए ही वापस लौटा देंगी।
 
इस ओल्ड ग्रीनविच विलेज में कई कलाकार आकर बसने लगे जिनको कम किराए वाले 18वीं सदी की तिकोना डच अटारियों और उत्तर की तरफ खिड़कियोँ वाले घर की तलाश रहती थी। वहीं एक बंगले के तीसरे माले पर सू और जोन्सी का स्टूडियो था। दोनों एट्थ स्ट्रीट के डेलमोनिको रेस्त्रां में मिले थे। वे एक दूसरे की कला और पूरे बदन ढँके पहनावे से इतने प्रभावित हुए कि एक ज्वाइंट स्टूडियो बना ली। वह मई का महीना था।
 
अब नवंबर आ चुका था और एक अज़नबी सर्दी ने दस्तक दी, जिसे डॉक्टर न्यूमोनिया नाम से बुलाते थे। कॉलोनी में न्यूमोनिया अपनी सर्द उंगलियों से कई लोगों को छूता चला गया। पूर्वी तरफ तो इस विनाशक रोग ने तेजी से पाँव पसारा और कई लोगों को अपना शिकार बनाया। लेकिन उलझे हुए रास्तों की भूलभुलैया जैसी गलियों वाली इस बस्ती में इसके कदम कुछ धीमे हो गए।

जोन्सी को न्यूमोनिया हो गया और वह अपने लोहे की पलंग पर पड़ी रहती थी। वह ज्यादा हिल-डुल नहीं सकती थी और कमरे की छोटी खिड़की से दिखते दूसरे घर की ईंट से बनी सूनी सी दीवार को निहारती रहती थी।

एक सुबह डॉक्टर ने सू को रूम के बाहर बुलाया। उसकी घनी भूरी भौं तनी हुई थी।
 
“उसके पास जीने के कितने चांस हैं- मैं कहूँगा दस में से एक। डॉक्टर अपने थर्मामीटर को झटककर पारा नीचे गिराते हुए बोलता जा रहा था, “और यह चांस भी तब जब वह जीना चाहेगी। लेकिन इस लड़की ने तो यह मन में बिठा लिया है कि वह कभी ठीक नहीं हो पाएगी। क्या उसके दिमाग में कुछ चल रहा है?”
 
“वह- वह किसी दिन नेपल्स की खाड़ी की पेंटिंग बनाना चाहती है।” सू ने कहा।
 
“पेंटिंग?- उफ्फ! क्या उसके दिमाग में कुछ ऐसा है जिसे वह बार-बार सोचे- जैसे कि किसी मर्द के बारे में?”डॉक्टर ने पूछा।
 
“मर्द? क्या मर्द इतने ज्यादा जरूरी हैं। नहीं डॉक्टर, ऐसा कुछ भी नहीं है।” सू बोल पड़ीं।
 
 
“ठीक है, तब तो यह उसकी मानसिक कमजोरी है। मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँगा। लेकिन जब मेरा पेशेंट मरने की सोचने लगता है तो मैं यह मानकर चलता हूं कि मेरी दवाई का असर पचास प्रतिशत कम होगा।”
 
 
डॉक्टर के जाने के बाद सू अपने वर्क-रूम में गई और बहुत रोई। उसके बाद वह जोन्सी के रूम में गुनगुनाती हुई, अपने ड्रॉइंग बोर्ड के साथ आई।
कहानी अभी जारी है- पहला पेज / दूसरा पेज / अंतिम पेज
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