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एक औरत के प्रेम पत्र – 2 – तुम मेरे कितने करीब हो!

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प्रिय, तुम्हारे नाम ने आज सुबह मुझे गहरी नींद से जगा दिया। मैंने पाया कि ख्वाब से निकलकर जब तक मैं बाहर आ पाती उससे पहले ही मेरे लब तुम्हारे नाम का गीत गुनगुना रहे थे।

मैं सोचने लगी कि जब मेरी रूह शांत पड़ी थी तब यह कौन दगाबाज़ था जो मेरे अंदर अबूझ सी बातें बोल रहा था। पिछली रात मैंने ख्वाब में देखा कि तुम एक बहुत बड़े पेड़ थे जिसके साये में मैं थी और आँधी हम दोनों को उड़ा ले गई।

इसके बाद क्या हुआ, मैं सब भूल चुकी हूं। इतना काफी था जिसकी वजह से नींद खुलते ही मैं काफी खुश थी।

वे सारे ख्वाब अब उसी तरह से बुझे-बुझे लग रहे हैं जैसे कि सुबह में अचानक दरवाजा खोलते ही सूरज का उजाला घर के अंदर जलती मोमबत्ती की रोशनी का अस्तित्व मिटा देता है। अब वह मोमबत्ती दीवारों को रोशन नहीं करती क्योंकि दिन की रोशनी उसके ऊपर हावी हो जाती है। उसी तरह, मैंने ख्वाब में क्या देखा, वह  सब भूल गई हूं क्योंकि दिन के उजाले में समाकर तुम आए और उन यादों को मिटा गए।

ओह! तुम कैसे हो? जग गए? बिस्तर से उठ गए? सुबह कुछ खाया कि नहीं? मैं तुमसे हजार बार पूछती हूं। तुम मेरे बारे में ही सोच रहे हो, मैं जानती हूँ। लेकिन क्या सोच रहे हो?

मैं अपने बारे में ऐसे सवालों को सोचकर खुश हो रही हूं। अगर मैं जान सकती कि कल जो कुछ भी मैंने अपने प्यार का इजहार करते हुए कहा उसे सोचकर आज तुम मुस्कुरा रहे हो तो मैं अपने बारे में सोचकर खुशी के मारे रोने लगूंगी।

एक तुम ही हो जो मुझे अपने बारे में सोचने पर मजबूर करते हो। तुम्हारी वजह से ही आज मैं अपनी तलाश कर रही हूं। पहले मुझे खुद पर अधिकार था और इसे मैं अपनी सबसे महान चीज समझती थी लेकिन तुम्हारे वश में आने के बाद वह भावना जाने कहां चली गई और मैं एक राज को जानने के लिए रोती रह गई जो मेरा नहीं था।

क्या मैं कभी जान पाऊंगी कि तुमने मुझसे इश्क क्यों किया? यह मेरी सूफियाना उलझन है लेकिन यह किसी संदेह से उपजा सवाल नहीं है। तुम मुझसे इश्क करते हो। क्यों करते हो, यह मैं कभी जान पाऊंगी?

तुमने भी अपने बारे में मुझसे यही सवाल पूछा था और इसका कोई जवाब तुमको नहीं मिला था क्योंकि मैं पूरी की पूरी तुम्हारी हो चुकी थी। मैं इस सवाल का जवाब तभी सोच पाती जब मैं अपनी सांसों को रोक पाती। अगर मैं अपने सांसों को एक पल के लिए रोक लेती और तुम्हारे बगैर दुनिया को देखने की कोशिश करती तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक जाती और किसी सुनसान-वीरान जगह में गिर जाती।

लेकिन, उसके बाद जैसे ही मैं डर के मारे सांस लेती तो मेरे सितारे मुझे बाहों में भर लेते और आसमान में चमककर तुम्हारा चेहरा मुझे दिखाते। ओ हसीन सितारे, मैं तुम्हारे साये में ही तो पैदा हुई थी, तुम मेरे साथ घूमते रहे और बचपन से मेरे बारे में खामोशी से भविष्यवाणियां करते रहे लेकिन मैं नहीं समझती थी कि उन बातों का मतलब क्या था- तुम्हारी चमक में मेरे आशिक का नाम छुपा हुआ था।

बचपन में कभी-कभी बिना किसी कारण के मैं बहुत खुश रहती थी। मुझे उस समय पंख लग गए थे। कभी कोई खेत परियों का देश बन जाता था और मैं इसमें से गुजरती थी। मैं सोचती हूँ कि धरती के इन जादुई पलों को तुमने भी जरूर जीया होगा। तुम्हें भी घास पर चलते हुए हवाओं की हल्की छुअन का अहसास हुआ होगा या बारिश के बाद और भी खिले-खिले दिखने वाले खुशबूदार फूलों के साये में तुम खड़े हुए होगे।

याद है एक बार मैंने तुमसे पूछा था कि तुम कहां-कहां रहकर जवां हुए। ऐसा मैंने इसलिए पूछा था कि क्योंकि मुझे लगता था कि शायद हम कहीं पहले भी मिले थे, लेकिन हम कहाँ मिले थे इसे मैं अपनी जवानी की खुशी को समेटते हुए याद नहीं कर पा रही थी।

मैं देख सकती हूं कि दूर कहीं कुछ रहस्य हमारा इंतजार कर रहा है। यह रहस्य कुछ ऐसा है जिसके बारे में मैं पहले अनुमान नहीं लगा सकती थी- तुम्हारे साथ उम्र बिताकर बूढ़े होने की खुशी।

क्या वह वक्त उस शाम की तरह ही खुशनुमा नहीं होगा जब हम दोनों एक दूसरे का हाथ थामे बैठे हुए थे और सूरज ढलते ही हमारे सर पर सितारे आकर चमकने लगे थे। उन पलों के जीवन में बीते दिनों की जाने कितनी यादें खिंचकर चली आई थी। क्या बुढ़ापे में भी हमारी मुहब्बत वैसी का वैसी ही नहीं रहेगी-सितारों से भरी यादों वाली जगह जैसी?

तुम्हार प्रेम-पत्र मेरे पास पड़ा है जब मैं यह सब लिख रही हूं। तुम इतने कम लफ्जों में सब कुछ कैसे कह देते हो!

कल तुम आओगे। मैं और क्या चाहूँगी- कल और उसके साथ आने वाली सौगातों के सिवा? तुम मेरे दिल में हो, मेरे प्रिय। दुनिया की और कोई भी चीज मेरे इतने करीब नहीं हो सकती, जितने तुम हो।

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