हीर रांझा – 7 – चेनाब नदी के किनारे पहुंचा रांझा

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दिन में तीसरे पहर जब सूरज पश्चिम दिशा में ढलने के लिए चल पड़ा, उस समय रांझा चेनाब नदी के किनारे खड़ा था। वहां कई और यात्री जमा थे जो नदी पार करवाने वाले मांझी लुड्डन का इंतजार कर रहे थे।

रांझा ने मांझी से कहा,’ऐ दोस्त, खुदा के लिए मुझे नदी पार करा दो।’ लुड्डन मांझी अपने तोंद पर हाथ फेरता हुआ हंसने लगा और उसका मजाक उड़ाते हुए बोला, ‘खुदा का प्यार हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता। हम तो पैसे के लिए नदी में नाव चलाते हैं।’

रांझा उससे गुजारिश करते हुए बोला,’मैं एक जरूरी यात्रा पर निकला हूँ और मंजिल तक पहुंचना बहुत जरूरी है। मैं तुम्हारे नाव की पतवार चलाऊँगा, मुझे ले चलो।’

मांझी ने जवाब दिया, ‘अपने खुदा से कहो कि वह तुम्हारे पैसे चुका दे। जो पैसे देता है बस उन्हीं को मैं उस पार ले जाता हूँ चाहे वह चोर हो या डाकू। लेकिन भिखारियों, फकीरों और जो बैठे-बैठे कुत्तों की तरह रोटी तोड़ते हैं, उनको भगा देता हूँ। जो जबरदस्ती नाव पर चढ़ने की कोशिश करता है, उसे हम नदी में फेंक देते हैं चाहे वह पीर का बेटा वारिस ही क्यों न हो। बिना कुछ लिए हम नदी पार नहीं कराते।’

आखिरकार रांझा मांझी की बातों को सुनकर परेशान हो गया और कोने में जाकर बैठ गया। उसने अपनी बांसुरी निकाली और महबूब से जुदाई के गीत का धुन बजाने लगा। उसकी आँखों के किनारे से आंसुओं के गर्म झरने गिर रहे थे और लग रहा था कि दुर्भाग्य ने उसे घेर लिया है।

बांसुरी की विरह राग सुनकर सभी मर्द और औरत नाव से उतरकर रांझे के आसपास बैठ गए। लुड्डन की दो बीवियां रांझे के पांवों को दबाकर सेवा करने लगी। मांझी लुड्डन यह सब देखकर गुस्से से लाल हो गया और बोलने लगा, ‘यह युवक कोई जादूगर है। इसने तो मेरी बीवियों को अपने वश में कर लिया है। हमें इस जाट के जाल से बचाओ. यह हमारी औरतों को भटकाकर ले जाएगा।’   — कहानी आगे पढ़ें-

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