शायरी – भूला हुआ कोई जख्म नस में तड़प उठे

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पास अंधेरा रहे और मैं तन्हा रहूं
कोई जुगनू जले तो मैं भी संग जलूं

भूला हुआ कोई जख्म नस में तड़प उठे
याद नहीं आता फिर भी मैं रो पड़ूं

कितना भी दर्द जगे, उफ्फ ना मैं करूं
कोई क्या जानेगा, आहें भी जो मैं भरूं

जीने की ख्वाहिश थी लेकिन अब नहीं है
शिकवा भी तुमसे आखिर मैं क्यूं करूं

©RajeevSingh

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