शायरी – ऐसे ही दरिया में बहते हम तो कितने रात जगे

अश्क बहे जब-जब मेरे तन्हा दिल में प्यास जगे

ऐसे ही दरिया में बहते हम तो कितने रात जगे

 

क्या करें हम जब ये सावन की घटाएं मुंह मोड़े

कितनी भी आवाज लगा लो, बारिश की न आस जगे

 

भला-बुरा क्या होगा है, सुख-दुख में क्या रखा है

इश्क ने इतना दर्द दिया, सब कुछ अब बेकार लगे

 

अपनी ही फूटी किस्मत पर हम ऐसे मुसकाते रहे

लुट गए जिनके लिए हम, वो हमसे बेजार लगे

 

रस्ता देख-देखके अब तो वही हताशा घिर आयी

कांटे सब अहसास हुए, जज्बे भी अब खार लगे

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