चाहत शायरी जख्म शायरी

शायरी – तुमको मालूम भी है, तुम्हें चाहती हूं बहुत

कितनी मुश्किल से गुजरता है लम्हा-लम्हा

इक लम्हा भी बिना तुझे याद किए गुजरता नहीं

 

हमसे पूछो ना किस तरह जीए जाते हैं हम

तुमको सोचूं मैं दिन-रात मगर जी भरता नहीं

 

तुमको मालूम भी है, तुम्हें चाहती हूं बहुत

नजरों से रोकती हूं लेकिन तू रूकता नहीं

 

क्या करूं मैं इस उलझन में डूबी रहती हूं

इक पल भी तेरे बिन मुझे चैन मिलता नहीं

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