शायरी – मेरे इस दर्द को कभी भी वो समझ न सकी

जो दास्तां न शुरू हो वो खतम क्या होगी

जो अजनबी थी उसे मेरी तलाश क्या होगी

 

मुझे मुहब्बत हुई तो लबों को खोला नहीं

नजर छुपाती रही वो तो बात क्या होगी

 

मेरे इस दर्द को कभी भी वो समझ न सकी

फिर मेरे गम से कभी वो उदास क्या होगी

 

जुदा हुई वो मगर जख्म दे गई इतना

सोचता हूं इससे अच्छी सौगात क्या होगी

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