महबूबा शायरी मुहब्बत शायरी

शायरी – मैं दिल जलाके ठहरी हूं कई शामों में

ना रो सकी तो आंसू को रोक आंखों में

तुझे जाते हुए देखती रही मैं शामों में

 

ये मुलाकात कब तक होगी इस दरिया पे

कब तलक होगी ये जुदाई इन शामों में

 

दीया जलाके बहा देते हो तुम पानी में

मैं दिल जलाके ठहरी हूं कई शामों में

 

कल चले आना मेरे पास तुम जरा पहले

वक्त कुछ और गुजर जाए तेरी शामों में

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