महबूब शायरी

शायरी – वफा की दरिया न बह सकी इस दुनिया में

वफा की दरिया न बह सकी इस दुनिया में

किसी सागर से न मिल सकी इस दुनिया में

 

कितने तरकीब हैं लोगों में जीने के लिए

हमें तो एक भी न मिल पायी थी इस दुनिया में

 

मैं किनारे पे ही मुंतजिर रह जाता हूं

कोई कश्ती ही न मिल सकी इस दुनिया में

 

अपनी तन्हाई में जिसको मैं लिखा करता हूं

वो गजल भी न मिल सकी इस दुनिया में

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