शायरी – सीने में शीशा है टूटा तो वो आग से क्यूं न पिघले

दिल से जीने से बेहतर तो अच्छा था मैं मर जाती

दर्द को पीने से बेहतर तो अच्छा था जहर पी जाती

 

अपनों की जंजीरों से तो घायल हो गए पांव कलाई

इसको तोड़के दुनिया में मैं आखिर किसके घर जाती

 

सीने में शीशा है टूटा तो वो आग से क्यूं न पिघले

बहते आंसू से छाती की जलन नहीं है बुझ पाती

 

कितने बरस की सजा है जिसको काटके जाऊंगी मैं

जीते जी दुख ने जलाया, काश चिता भी मिल जाती

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