शायरी – भूल से एक बार नजर जो उठी तेरी तरफ

भूल से एक बार नजर जो उठी तेरी तरफ

फिर कभी देख ना पाए हम दुनिया की तरफ

 

रोक लिया था तुमने मुझे अपनी जमीं पे

इसलिए बढ़ न पाए हम आस्मा की तरफ

 

जिसके बहने से संवरती है मेरी तन्हाई

रोज जाता हूं मैं रोने उसी दरिया की तरफ

 

मुंतजिर कोई भी मेरे लिए अब दर पे नहीं

जाऊं किसके लिए फिर अपने आशियां की तरफ

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