शायरी – इन बेदिलों की भीड़ में, हम खोजते थे दिल कहीं

एक ख्वाब जो टूटा कहीं, फिर नींद न मिल पायी थी

हम रातभर यूं जागे थे कि आँख खुल न पायी थी

 

तिनको को लब पे बांधकर हम चल पड़े थे शाख पर

घर तो कई हैं बना चुके, बुलबुल ही न मिल पायी थी

 

रोकर ही हम हंसते रहे, गाकर ही हम लिखते रहे

तन्हा खुद सुनते रहे, महफिल ही न मिल पायी थी

 

इन बेदिलों की भीड़ में, हम खोजते थे दिल कहीं

वो फूल जो अजीज थी, गुलशन में न खिल पायी थी

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