शायरी – तेरी जुल्फ में लगा सकूं, वो कली न मैं खिला सकूं

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तेरी जुल्फ में लगा सकूं, वो कली न मैं खिला सकूं
बेबस खिजां में बैठा हूं, वो बहार भी न मैं ला सकूं

सावन की एक फुहार से मैंने मांग ली कुछ बूंद भी
जिसे आंख में तो भर लिया, उसे अब न मैं गिरा सकूं

कहा भी क्या समझा नहीं, देखा भी क्या सोचा नहीं
यूं खो गया मैं खुद में ही कि कहीं भी न मैं जा सकूं

सर पे जब सदियां गिरी, मैं फलक में जाके धंस गया
अब चांद के मानिंद मैं जमीं पे भी न आ सकूं

फलक- आसमान

खिजां- पतझड़

©RajeevSingh # love shayari #share photo shayari

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One thought on “शायरी – तेरी जुल्फ में लगा सकूं, वो कली न मैं खिला सकूं”

  1. Darde dil ki dava hum nahi karte vo bhi kahte hai bewafa jo hum kise vafa nahi karte.

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