शायरी – अपनी आंखों और होठों में प्यास दबाए जीती हूं

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बदन की गलियों में जब तेरी आहट होती है
मेरे होठों पर दबी-दबी मुस्कुराहट होती है

तू मुसाफिर सा मन की राहों पे आता है
तुझे रोक इश्क करने की चाहत होती है

अपने जिस्म में एक प्यास दबाए जीती हूं
तेरे खयालों के समंदर से ये प्यास बढ़ती है

जहां भी रहूं दिल में तेरी सूरत रहती है
जहां भी जाऊं बस तेरी ही याद होती है

©RajeevSingh

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One thought on “शायरी – अपनी आंखों और होठों में प्यास दबाए जीती हूं”

  1. जेहा भी रहु तेरी याद हेमसा शाथ रहती कया बताऊ

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