महबूबा शायरी

शायरी – इश्क के सागर में वो दूर गई इतनी

तेरी सूरत का चिराग जो बुझा जीवन से मुद्दतों तक आईने में कोई चेहरा न दिखा

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तेरी सूरत का चिराग जो बुझा जीवन से
मुद्दतों तक आईने में कोई चेहरा न दिखा

इश्क के सागर में वो दूर गई इतनी
कि कश्ती को फिर अपना किनारा न दिखा

इन अंधेरों में अब सुकूं नहीं मिलता
मगर इसके सिवा कोई सहारा न दिखा

मैंने चांद को तलाशा बहुत आस्मा में
मगर अमावस में मुझको उजाला न दिखा

©RajeevSingh

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