हीर रांझा -10 – हीर के हुस्न की चर्चा

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हीर जितनी खूबसूरत थी, उसकी सखियां उतनी ही हसीन थीं। दुनिया में शायद ही कोई नस्ल होगी जो खूबसूरती में सियालों के कुनबे की इन हसीनाओं का मुकाबला कर सकती थी।

हीर को अपने हुस्न पर बड़ा नाज़ था। उसके कानों में मोतियों से बने झुमके चमक रहे थे। हीर का हुस्न अपने आप में कयामत की तरह था। उसको देखते ही लोग जमीं और जन्नत को भूल जाते थे।

ओ कवि, तुम कैसे हीर के हुस्न का बखान करोगे? मुहब्बत से भरी उसकी आंखें जूही के फूल सी नर्म दिखती थी। उसके गाल गुलाब की पंखुरियों से कोमल थे। उसके होठों की लाली देखकर लोग खुदा, खुदा करके रोने लगते थे।

हीर और सखियां नदी में नहाने आईं। वे सब उस नाव के पास आईं तो सबने देखा कि हीर की गद्दी पर कोई मासूम सा युवक लाल शॉल ओढ़े सोया है। हीर की नजर जैसे ही रांझे पर गई वह गुस्से से लाल हो गई।

उसने क्रोध में आकर लुड्डन स कहा, ‘लुड्डन, बदमाश! मेरी गद्दी का अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुमने किसको उस पर सुलाया है? क्या तुम मेरी इज्जत नहीं करते या खुदा के डर से तुमने ऐसा किया है?’

लुड्डन हाथ जोड़कर कहने लगा,’मुझे माफ करो, मैं बेकसूर हूं। मैंने इस लड़के को यहां सोने के लिए नहीं कहा। यह बिन बुलाए मेहमान की तरह यहां आया। इसके बांसुरी की धुन ने हम सब के दिल पर जादू कर दिया। अपने हुस्न पर इतना गुमां न करो, शहजादी। अपने सेवकों पर जुल्म तो न करो। तानाशाह भी खुदा से डरते हैं।’

हीर का गुस्सा कम नहीं हुआ। उसने जवाब दिया,’इस लड़के को कोई परवाह नहीं कि इसने कितना बड़ा गुनाह किया है। क्या यह नहीं जानता यह फिलहाल वहां है जहां मेरे पिता चूचक का साम्राज्य है? मैं किसी की परवाह नहीं करती चाहे वह शेर हो या हाथी या फिर किसी सामंत का बेटा। यह है कौन? मेरे पास तो इसके जैसे हजारों गुलाम हैं और ऐसे लोगों की मैं कोई परवाह नहीं करती।’      कहानी आगे पढ़ें-

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