हीर रांझा -11 – हीर का गुस्सा और रांझे का प्यार

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लुड्डन को खरी-खोटी सुनाने के बाद हीर रांझा की तरफ मुड़ी।

वह गुस्से में जोर से बोली, ‘ऐ सोनेवाले, मेरे बिस्तर से उठ जाओ। कौन हो तुम और सोने के लिए तुमको मेरा ही बिस्तर मिला? मैं दिनभर सखियों के साथ यहां खड़ी देख रही हूं। मुझे बताओ कि तुम घोड़े बेचकर क्यों सो रहे हो? क्या तुम्हारे बुरे दिन आ गए हैं जो तुम चाबुक खाने के लिए यह खतरा उठा रहे हो? क्या तुमको रातभर नींद नहीं आई जो तुम खर्राटे मार रहे हो? या तुम ये सोचकर बेपरवाह होकर इस बिस्तर पर सो गए जैसे कि दुनिया में इसका कोई मालिक ही न हो?

हीर के इतना चिल्लाने के बावजूद जब रांझा की नींद नहीं खुली तो उसने अपनी सेविकाओं को उसे जबर्दस्ती उठाने को कहा। हुस्न की शहजादी हीर का गुस्सा बेकाबू हो चुका था।

तभी रांझा ने अपनी आंखे खोली और उठकर कहने लगा, ‘मेरे साथ नजाकत से पेश आओ, ऐ खूबसूरत शहजादी।’

रांझा के बोल सुन हीर का गुस्सा उसी तरह पिघल गया मानो कश्मीर के बर्फ पर जेठ की जलती धूप पड़ गई हो।

रांझा की एक बांह में बांसुरी लटकी थी और कानों में उसने कुंडल पहन रखे थे। रांझा का सौंदर्य उस वक्त पूनम के चांद की तरह चमक रहा था।

हीर और रांझा की आंखें चार हुईं और मुहब्बत के मैदान में एक दूसरे से टकराने लगीं। हीर का दिल खुशियों के सागर में गोते खाने लगा।

हीर रांझा से सटकर उसी तरह जा बैठी जैसे कि तरकश में तीर पनाह लेती है। दोनों एक दूसरे से प्यार से बातें करने लगे। मुहब्बत वहां मैदान मार ले गई।

हीर को अपने दिल पर वश न रहा जैसे वह अपने होशोहवास खो बैठी थी। वह अपने हुस्न पर नाज करना भूलकर रांझा पे अपना सब कुछ वारने को तैयार हो गई। कहानी आगे पढ़ें-

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